जिस दिन सु-काम की मौत हुई: लिक्विडेशन के बंद कमरों का वो सच जो कोई नहीं बताता
3 अप्रैल 2019 को जब NCLT ने सु-काम के लिक्विडेशन का आदेश सुनाया, तो सिर्फ़ एक कंपनी का अंत नहीं हुआ—भारत की 30 साल पुरानी स्वदेशी पावर इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति पर ताला जड़ दिया गया। जानिए जब अदालत का हथौड़ा चलता है, तो 6 कारखानों, 77 पेटेंट्स, 50 देशों के नेटवर्क और 5,000 परिवारों की रोज़ी-रोटी की नीलामी कैसे होती है।

“जब कोई अदालत किसी चालू विनिर्माण कंपनी के लिक्विडेशन का आदेश लिखती है, तो उस कागज़ की स्याही से हज़ारों घरों के चूल्हे बुझ जाते हैं। उस दिन कोई बिज़नेस नहीं मरता—उस दिन तीस साल का पसीना, स्वदेशी पेटेंट और भारत का एक औद्योगिक गौरव कबाड़ के तराज़ू पर तौल दिया जाता है।”
3 अप्रैल 2019।
यह आज़ाद भारत के कॉरपोरेट और मैन्युफैक्चरिंग इतिहास का वह तारीख़ी दिन है जिसे कोई भी सच्चा उद्यमी कभी नहीं भूल सकता।
National Company Law Tribunal (NCLT), नई दिल्ली की बेंच में जज की मेज़ पर एक फ़ाइल रखी थी। चंद मिनटों की सुनवाई हुई, फ़ाइल पर दस्तख़त हुए और आदेश जारी हो गया: “Su-Kam Power Systems Limited को Liquidation में भेजा जाता है।”
अदालत के उस वातानुकूलित कमरे में वकीलों ने अपनी फ़ाइलें समेटीं, बैंकरों ने राहत की सांस ली कि एनपीए का झंझट छूटा, और लिक्विडेटर ने अपनी करोड़ों की फ़ीस का हिसाब लगाया।
लेकिन उस एक आदेश के पीछे क्या हुआ?
तीस साल पहले एक छोटे से किराए के कमरे से शुरू हुई कंपनी—जिसने 6 विश्वस्तरीय फ़ैक्टरियाँ बनाई थीं, 77 तकनीकी पेटेंट रजिस्टर कराए थे, 50 से ज़्यादा मुल्कों में भारत का झंडा लहराया था, और जो ₹600 करोड़ के सालाना टर्नओवर पर थी—उसे एक झटके में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया।
यह किसी आर्थिक थ्योरी का पन्ना नहीं है; यह उस दिन का नंगा सच है जब एक चलती-फिरती औद्योगिक विरासत का पोस्टमार्टम किया गया।
1. 250 करोड़ का कैश ऑफ़र ठुकराया: बैंकों की ‘कमर्शियल विज़डम’ का नंगा नाच
लिक्विडेशन का आदेश कोई अचानक हुआ हादसा नहीं था; यह बैंकों की हठधर्मिता और कायरता का नतीजा था।
जब 2018 में CIRP चल रहा था, तो कोटक-समर्थित एक बड़े कंसोर्टियम ने कंपनी को चालू रखने के लिए ₹250 करोड़ का ठोस रिवाइवल प्लान मेज़ पर रखा था:
- उस प्रस्ताव में हज़ारों कामगारों और इंजीनियरों की नौकरियाँ सुरक्षित थीं।
- 6 कारखाने बदस्तूर चालू रहने वाले थे।
- सप्लायरों और वेंडरों को आगे का काम मिलने वाला था।
- और बैंकों को एकमुश्त ₹250 करोड़ की सीधी रिकवरी मिल रही थी।
लेकिन बैंकों की कमिटी (CoC) ने अपनी तथाकथित ‘Commercial Wisdom’ के अहंकार में वह प्लान ठुकरा दिया। बैंकरों को लगा कि वे लिक्विडेशन में कंपनी की संपत्तियाँ अलग-अलग बेचकर इससे ज़्यादा वसूल लेंगे।
और 3 साल बाद जब सब कुछ बिक गया, तो बैंकों के हाथ में क्या आया?
महज़ ₹8 से 9 करोड़!
₹250 करोड़ का प्रस्ताव ठुकराकर ₹9 करोड़ की रद्दी पर समझौता करना—क्या कोई सामान्य इंसान भी ऐसा सौदा करेगा? लेकिन इस देश के सरकारी बैंकिंग तंत्र में किसी भी अफ़सर की पेंशन नहीं रुकी, किसी पर कोई जाँच नहीं बैठी। नुक़सान हुआ तो देश की अर्थव्यवस्था का और उस उद्यमी का जिसने इसे बनाया था।

2. दिन 01: ताले, बाउंस चेक और मज़दूरों का क्रंदन
जिस पल लिक्विडेशन का आधिकारिक आदेश ज़मीन पर उतरा, नरक का दरवाज़ा खुल गया:
- कारखानों पर लिक्विडेटर का पहरा: बद्दी और गुड़गांव के कारखानों के गेट पर हथियारबंद गार्ड खड़े कर दिए गए। वे इंजीनियर और कामगार, जो कल तक गर्व से भारत की सबसे उन्नत सोलर तकनीक बना रहे थे, उन्हें अपने टूलबॉक्स और निजी सामान तक समेटने का मौक़ा नहीं दिया गया।
- कर्मचारियों की तबाही: लगभग 5,000 परिवारों की आजीविका एक झटके में ख़त्म हो गई। पीएफ़, ग्रेच्युटी और महीनों की तनख़्वाह कागज़ों के नीचे दब गई। धारा 53 के जिस वाटरफॉल का ज़िक्र हमने Part 01 में किया था, उसमें मज़दूरों का हक़ सबसे ऊपर लिखा ज़रूर है, लेकिन जब कंपनी को कौड़ियों के भाव बेचा जाएगा तो बंटेगा क्या?
- वेंडर्स और MSME सप्लायर्स का उजड़ना: जिन सैकड़ों छोटे कारोबारियों ने हमें कॉपर वायर, ट्रांसफ़ॉर्मर कोर, और कैबिनेट सप्लाई किए थे, उनके करोड़ों के बिल हमेशा के लिए डूब गए। सु-काम के साथ-साथ दिल्ली, हरियाणा और हिमाचल के दर्जनों छोटे वेंडर दिवालिया हो गए।

3. अमूर्त संपत्तियों की खुली लूट: 77 पेटेंट और ब्रांड की डकैती
सु-काम सिर्फ़ ईंट, गारे और लोहे का नाम नहीं था।
कंपनी की असली ताक़त थी उसकी बौद्धिक संपदा (Intellectual Property):
- 77 रजिस्टर्ड तकनीकी पेटेंट—जिन्होंने भारत को सोलर हाइब्रिड और हाई-फ़्रीक्वेंसी इन्वर्टर तकनीक में आत्मनिर्भर बनाया था।
- एक ऐसा ब्रांड नाम जिसे देश का हर आम नागरिक पहचानता था और जिस पर भरोसा करता था।
- 50 मुल्कों में फैला हुआ डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क।
लेकिन लिक्विडेशन की गिद्ध-संस्कृति में क्या हुआ?
वैल्युअर्स और लिक्विडेटर ने इन 77 पेटेंट्स का मूल्य आँका: शून्य (₹0)।
ब्रांड ‘Su-Kam’ को कोविड के लॉकडाउन के दौरान, जब पूरा देश घरों में बंद था, गुपचुप तरीक़े से बिना किसी वैश्विक प्रचार के लगभग मुफ़्त के भाव एक तीसरे पक्ष को सौंप दिया गया। जिस ब्रांड की मार्केट इक्विटी सैकड़ों करोड़ थी, उसे कागज़ों पर ऐसे उड़ा दिया गया मानो उसकी कोई हैसियत ही न थी।
4. लिक्विडेशन इंडस्ट्री का असली धंधा: गिद्धों की दावत
जब कोई कंपनी लिक्विडेट होती है, तो एक ही तबका जश्न मनाता है—लिक्विडेशन कार्टेल।
- कबाड़ माफिया और स्क्रैप डीलर: वे जानते हैं कि जो मशीनें 50 करोड़ में खरीदी गई थीं, लिक्विडेटर उसे 2 करोड़ में बेचेगा क्योंकि उसे जल्दी फ़ाइल बंद करनी है।
- लिक्विडेटर की अनियंत्रित फ़ीस: कंपनी के बैंक खाते में जितना भी कैश रिज़र्व या रिकवरी बची थी, सबसे पहले लिक्विडेटर की लाखों की महीने की फ़ीस, उसकी लीगल टीम के बिल और सुरक्षा गार्डों के ख़र्चे काटे गए।
- IBBI की बाद की कार्रवाई: बाद में जब हमने इस पूरी प्रक्रिया में हुई धांधली, वैलुएशन के फर्जीवाड़े और नियमों के उल्लंघन को उजागर किया, तो Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) ने जाँच बैठाई। IBBI ने माना कि नियुक्त किए गए RP और लिक्विडेटर ने नियमों की धज्जियाँ उड़ाई थीं, और उन पर पेनल्टी लगाई।
लेकिन सवाल वही है: जब मरीज़ मर चुका हो, तो डॉक्टर का लाइसेंस सस्पेंड करने से क्या मरीज़ ज़िंदा हो जाएगा?
लिक्विडेशन का पोस्टमार्टम: कौन क्या ले गया?
| पक्ष | क्या मिला / क्या गँवाया |
|---|---|
| बैंक (Financial Creditors) | ₹250 करोड़ का पक्का ऑफ़र ठुकराया; 3 साल बाद हाथ में आए महज़ ₹8-9 करोड़। |
| कर्मचारी और कामगार | 5,000 नौकरियाँ ख़त्म, परिवारों का भविष्य अंधकारमय, बकाया वेतन वर्षों अटका। |
| सप्लायर्स (MSME वेंडर्स) | शून्य रिकवरी; दर्जनों सप्लायर फ़ैक्टरी बंद होने से खुद दिवालिया हो गए। |
| भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर | 77 पेटेंट ख़त्म; खाली हुए बाज़ार पर चीनी कंपनियों ने तुरंत कब्ज़ा कर लिया। |
| लिक्विडेटर & लीगल सिंडिकेट | करोड़ों की सुरक्षित फ़ीस और कमीशन—बिना किसी व्यावसायिक जोखिम के। |
| फाउंडर (कुंवर सचदेव) | 30 साल की ज़िंदगी भर की कमाई ख़त्म, और ऊपर से पर्सनल गारंटी का शिकंजा। |
निष्कर्ष: जब राज्य ही अपने निर्माताओं को मार डाले
सु-काम का लिक्विडेशन किसी एक बिज़नेस का सामान्य अंत नहीं था। यह इस बात का सबूत था कि भारत का लीगल और बैंकिंग सिस्टम किसी फ़ैक्टरी को बचाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी लाश को नोचने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
जिस दिन सु-काम मरी, उस दिन सिर्फ़ मेरी कंपनी नहीं मरी थी—उस दिन भारत में हार्डवेयर रिसर्च और स्वदेशी मैन्युफैक्चरिंग का सपना देखने वाले हर नौजवान के हौसले पर बुलडोज़र चला था।
और इस पूरी त्रासदी के बाद सिस्टम ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए क्या किया?
उन्होंने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि जो भी उद्योगपति अपनी फ़ैक्टरी नहीं बचा पाया, वह ‘अपराधी’ है, वह ‘चोर’ है।
उद्यमी को एक डिफ़ॉल्ट के बाद अपराधी कैसे बना दिया जाता है? समाज और व्यवस्था कैसे निर्माता की पगड़ी उछालती है?
उस व्यवस्थागत चरित्र-हनन की कड़वी दास्तान हम देखेंगे Part 08: The Entrepreneur as Criminal Under the IBC में।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
- Q1: सु-काम के मामले में NCLT ने लिक्विडेशन का आदेश कब दिया?
- NCLT नई दिल्ली की बेंच ने 3 अप्रैल 2019 को सु-काम पावर सिस्टम्स लिमिटेड के लिक्विडेशन का औपचारिक आदेश पारित किया।
- Q2: क्या लिक्विडेशन से पहले कोई रिवाइवल प्लान मौजूद था?
- हाँ। CIRP प्रक्रिया के दौरान कोटक-समर्थित कंसोर्टियम ने ₹250 करोड़ का ठोस रेज़ोल्यूशन प्लान दिया था जिससे कारखाने चालू रहते, लेकिन बैंकों की कमिटी (CoC) ने उसे अस्वीकार कर दिया।
- Q3: लिक्विडेशन के बाद बैंकों को कुल कितनी रिकवरी हुई?
- तीन साल से अधिक चले लिक्विडेशन के बाद बैंकों को कुल मिलाकर महज़ ₹8 से 9 करोड़ के आसपास की रिकवरी हुई, जो मूल ₹250 करोड़ के ऑफ़र का महज़ एक छोटा सा अंश था।
इस सीरीज़ में
The IBC Files: भारत का दिवालिया क़ानून — अनुभवजन्य रिकॉर्ड
हिंदी · भाग 01–17 लाइव
- भाग 01 · HI
IBC के संशोधन: फ़ैक्टरी या बैंक का बहीखाता? - भाग 02 · HI
टूटा हुआ सिस्टम - भाग 03 · HI
IBC: क़र्ज़ का जाल - भाग 04 · HI
फ़ेयर बनाम लिक्विडेशन वैल्यू - भाग 05 · HI
Section 29A - भाग 06 · HI
CIRP की बेबसी: 180 दिन - भाग 07 · आप यहाँ हैं
जिस दिन सु-काम की मौत हुई - भाग 08 · HI
उद्यमी = मुजरिम - भाग 09 · HI
पर्सनल गारंटी का फंदा - भाग 10 · HI
आईबीबीआई पेनल्टी, शून्य मुआवज़ा - भाग 11 · HI
सप्लायर्स का मूक नरसंहार - भाग 12 · HI
कार और फ़ैक्टरी - भाग 13 · HI
होम लोन बनाम फ़ैक्टरी लोन - भाग 14 · HI
सुभाष चंद्रा केस - भाग 15 · HI
बिल्डर बनाम बाबू - भाग 16 · HI
77 पेटेंट और चीनी क़ब्ज़ा - भाग 17 · HI
राख से पुनर्जन्म - भाग 18–20 · EN hub / आगामी →
कुंवर सचदेव
संस्थापक एवं एमडी, सु-कैम पावर सिस्टम्स (1988–2019) और Kunwwer.ai — मैन्युफैक्चरिंग, दिवालियापन और सभ्यतागत स्मृति पर लेखन। उनकी कहानी पढ़ें →