THE IBC FILES · भाग 10 · हिंदी

आईबीबीआई ने आरपी और लिक्विडेटर पर जुर्माना तो ठोक दिया, लेकिन उस उद्यमी के तीस साल कौन लौटाएगा?

जब सु-काम को मिटा दिया गया, तब नियामक IBBI ने जांच में माना कि रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल और लिक्विडेटर दोनों ने नियमों की धज्जियाँ उड़ाई थीं। उन पर नाममात्र की पेनल्टी लगी। लेकिन सवाल यह है: जब सिस्टम का अफ़सर किसी चालू उद्योग की हत्या कर दे, तो उस बर्बादी का हर्जाना किसे मिलता है? फाउंडर को, कामगारों को या सिर्फ़ सरकारी खज़ाने को?

लेखक: कुंवर सचदेव · The IBC Files, भाग 10 · ← भाग 09 · अगला → भाग 11 · English version →

Heavy process plant equipment standing silent after regulatory violations
प्रक्रियागत उल्लंघनों की बलि चढ़ी फ़ैक्टरी: नियामक ने माना कि अफ़सरों ने नियमों की धज्जियाँ उड़ाईं, उन पर जुर्माना भी लगाया—लेकिन जो प्लांट उजड़ गया, वह दोबारा कभी चालू नहीं हुआ।
“अगर कोई डॉक्टर जानबूझकर लापरवाही करके मरीज़ की जान ले ले, और मेडिकल काउंसिल उस पर दस हज़ार रुपये का जुर्माना लगाकर फ़ाइल बंद कर दे—तो क्या उसे इंसाफ़ कहेंगे? आईबीसी में ठीक यही हुआ। जिस रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल और लिक्विडेटर ने एक चलते-फिरते राष्ट्रीय ब्रांड की हत्या कर दी, नियामक ने उन पर पेनल्टी तो ठोक दी, लेकिन उस अपराध की सज़ा भुगतने वाला उद्यमी आज भी कफ़न ओढ़े खड़ा है।”

कॉरपोरेट मामलों के जानकार अक्सर कहते हैं कि भारतीय दिवालिया व्यवस्था में एक सख़्त नियामक बैठा है—Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI)।

दावा किया जाता है कि अगर कोई रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) या लिक्विडेटर मनमानी करेगा, तो IBBI की डिसिप्लिनरी कमेटी उस पर डंडा चलाएगी।

कागज़ पर यह व्यवस्था बहुत मुस्तैद दिखती है। लेकिन जब यह डंडा चलता है, तो उस तमाशे की ज़मीनी हक़ीक़त क्या होती है?

सु-काम का मामला भारत के दिवालिया इतिहास का वह अभूतपूर्व केस है जहाँ कंपनी के आरपी और लिक्विडेटर दोनों को IBBI ने आधिकारिक जाँच के बाद नियमों के गंभीर उल्लंघन का दोषी पाया और दोनों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए पेनल्टी लगाई।

नियामक ने अपने आदेशों में काले अक्षरों में दर्ज किया कि प्रक्रिया के दौरान स्थापित क़ायदों को तोड़ा गया, हितों का टकराव हुआ और निष्पक्षता की बलि चढ़ाई गई।

लेकिन इस तथाकथित ‘न्याय’ का असली चेहरा देखिए: जिन अफ़सरों ने करोड़ों की कंपनी को कबाड़ बना दिया, वे चंद लाख रुपये का जुर्माना भरकर अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ गए।

और जिस उद्यमी के तीस साल, 77 पेटेंट और हज़ारों कामगारों का भविष्य छीन लिया गया, उसे क्या मिला? शून्य।

Series hinge: Part 09 ने दिखाया पर्सनल गारंटी कैसे घर की छत तक पहुँचती है। Part 10 पूछता है—जब IBBI खुद आरपी/लिक्विडेटर को दोषी माने, तो उद्यमी का मुआवज़ा कहाँ है?

1. आईबीबीआई के आदेश: जब सरकारी मुहर ने धांधली कबूल की

सु-काम की इनसॉल्वेंसी और लिक्विडेशन कोई साधारण प्रक्रिया नहीं थी; यह शुरू से ही प्रक्रियागत उल्लंघनों की एक सुनियोजित शृंखला थी।

जब हमने बार-बार अदालतों और नियामक के दरवाज़े खटखटाए, तो IBBI की डिसिप्लिनरी कमेटी को आख़िरकार संज्ञान लेना पड़ा:

  • आरपी का आचरण: जाँच में सामने आया कि रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल ने वैल्यूएशन की निष्पक्षता, सूचना ज्ञापन (Information Memorandum) तैयार करने और बैठकों के संचालन में गंभीर प्रक्रियागत ख़ामियाँ की थीं।
  • लिक्विडेटर की मनमानी: लिक्विडेशन के दौरान संपत्तियों की बिक्री, ई-ऑक्शन की शर्तों और अमूर्त संपत्तियों (पेटेंट्स और ब्रांड) के निपटारे में स्थापित नियमों को ताक पर रखा गया।
  • नियामक का फ़ैसला: IBBI ने दोनों अधिकारियों के ख़िलाफ़ सख़्त टिप्पणियाँ कीं, उनके आचरण को कोड ऑफ़ कंडक्ट के ख़िलाफ़ माना और उन पर मौद्रिक जुर्माना (Monetary Penalty) लगाया।

यह कोई आरोप नहीं था; यह भारत सरकार के वैधानिक नियामक का आधिकारिक निष्कर्ष था कि इस केस में सिस्टम के पहरुओं ने ही क़ानून तोड़ा था।

Abandoned workstations representing uncompensated industrial destruction
सन्नाटे में डूबा कार्यस्थल: आरपी और लिक्विडेटर पेनल्टी भरकर मुक्त हो गए, लेकिन इस फ़र्श पर काम करने वाले हज़ारों हुनरमंद हाथों के नुक़सान की भरपाई के लिए क़ानून में कोई प्रावधान नहीं है।

2. पाँच लाख का जुर्माना बनाम ₹300 करोड़ की तबाही

इस पूरे सिस्टम की क्रूर विडंबना इसके अनुपातिक संतुलन में है।

ज़रा दोनों पलड़ों की तुलना कीजिए:

  1. एक तरफ़: ₹300 करोड़ की चालू मैन्युफैक्चरिंग कंपनी, 6 अत्याधुनिक कारखाने, 77 रजिस्टर्ड पेटेंट, 5,000 परिवारों की रोज़ी-रोटी और एक ऐसा स्वदेशी ब्रांड जिसने आयातित चीनी इन्वर्टरों को बाज़ार से खदेड़ दिया था।
  2. दूसरी तरफ़: लिक्विडेटर और आरपी पर लगाया गया महज़ कुछ लाख रुपयों का जुर्माना!

जिस अफ़सर ने अपनी नासमझी और मनमानी से सैकड़ों करोड़ की राष्ट्रीय औद्योगिक संपदा को कबाड़ में बदल दिया, वह उस फ़ीस का एक छोटा सा हिस्सा जुर्माने के रूप में जमा करता है जो उसने उसी बर्बाद होती कंपनी के ख़ज़ाने से वसूली थी।

वह जुर्माना भी सरकार के खाते में जाता है। उस पैसे में से एक रुपया भी न तो उन मज़दूरों को मिलता है जिनकी नौकरियाँ गईं, न उन वेंडरों को मिलता है जिनका पेमेंट डूबा, और न उस फाउंडर को मिलता है जिसकी पूरी ज़िंदगी छीन ली गई।

Corporate campus standing as evidence of uncompensated enterprise destruction
गुरुग्राम का हेडक्वार्टर: सिस्टम ने यह तो मान लिया कि अधिकारियों ने ग़लती की, लेकिन उस ग़लती से तबाह हुए इस पूरे साम्राज्य को दोबारा खड़ा करने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं है।

3. संस्थागत जवाबदेही का अभाव: जब रक्षक ही भक्षक बन जाए

आईबीसी का सबसे बड़ा संरचनात्मक दोष यह है कि इसमें Restitution (पुनर्स्थापना) का कोई कानूनी रास्ता नहीं है।

अगर कोई प्रमोटर ज़रा सी चूक कर दे, तो धारा 29A के तहत उसे हमेशा के लिए बाहर कर दिया जाता है, उसकी पर्सनल गारंटी ज़ब्त कर ली जाती है और उसे मुजरिम बना दिया जाता है।

लेकिन अगर एक आरपी या लिक्विडेटर:

  • कंपनी की संपत्ति का ग़लत वैल्यूएशन करे,
  • ₹250 करोड़ का रिवाइवल प्लान ठुकराने में बैंकरों की मिलीभगत का हिस्सा बने,
  • 77 पेटेंट्स को ₹0 आँक कर कबाड़ में बिकवा दे—

तो उसके ख़िलाफ़ क्या होता है? कोई जेल नहीं, कोई संपत्ति कुर्की नहीं। सिर्फ़ एक नोटिस, एक कागज़ी सुनवाई और एक टोकन पेनल्टी। उसके बाद वह अगली कंपनी को लिक्विडेट करने के लिए फिर से बाज़ार में निकल जाता है।

क़ानून ने आरपी और लिक्विडेटर को असीमित अधिकार दिए, लेकिन उन अधिकारों के दुरुपयोग पर शून्य दीवानी जवाबदेही (Zero Civil Liability) रखी।

न्याय का पाखंड: किसे क्या मिला?

पक्षक़ानून के उल्लंघन का नतीजावास्तविक स्थिति
आरपी और लिक्विडेटरIBBI द्वारा दोषी करार; टोकन पेनल्टी लगाई गई।करोड़ों की फ़ीस पहले ही वसूली; पेनल्टी भरकर आज भी प्रैक्टिस जारी।
नियामक (IBBI)अपनी पीठ थपथपाई कि उसने सख़्त कार्रवाई की।जुर्माना सरकारी खाते में जमा हुआ; प्रक्रिया की मूल बर्बादी पर पर्दा।
बैंक (Financial Creditors)अयोग्य अफ़सरों के फैसलों पर आँख मूँद कर मुहर लगाई।₹250 करोड़ छोड़कर ₹9 करोड़ वसूले; बाकी घाटा फाउंडर से माँग रहे हैं।
उद्यमी (कुंवर सचदेव)दोष साबित होने के बाद भी कोई राहत नहीं।30 साल की मेहनत ख़ाक, संपत्तियाँ नीलाम और मुकदमों का अंतहीन बोझ।
कर्मचारी और वेंडर्सबिना किसी गुनाह के बेरोज़गार और बर्बाद।वाटरफॉल में शून्य; किसी भी पेनल्टी में एक पैसे की हिस्सेदारी नहीं।

निष्कर्ष: जब तक हर्ज़ाना नहीं, तब तक न्याय सिर्फ़ एक दिखावा है

सु-काम के मामले में IBBI का पेनल्टी ऑर्डर किसी जीत का प्रतीक नहीं है; यह इस सिस्टम के दिवालियापन का सबसे बड़ा सुबूत है।

यह इस बात का लिखित प्रमाण है कि हमारी फ़ैक्टरी बाज़ार की मार से नहीं मरी थी—उसे उन लोगों ने मारा था जिन्हें क़ानून ने उसकी रक्षा के लिए बैठाया था।

अगर कोई व्यवस्था किसी बेगुनाह को सज़ा मिलने के बाद यह कबूल कर ले कि प्रक्रिया ग़लत थी, लेकिन उस बेगुनाह को मुआवज़ा देने या उसकी संपत्ति लौटाने से इनकार कर दे—तो वह न्याय व्यवस्था नहीं है। वह सिर्फ़ एक प्रशासनिक तमाशा है।

और इस तमाशे का सबसे भयानक असर किस पर पड़ता है?

उस छोटे सप्लायर पर, उस एमएसएमई वेंडर पर, जिसने फ़ैक्टरी पर भरोसा करके लाखों का माल दिया था और जो धारा 53 के खूनी वाटरफॉल में चुपचाप डूब गया।

उस मूक नरसंहार की अनसुनी दास्तान हम देखेंगे भाग 11: The Silent Bloodbath — How the IBC Drowns Operational Creditors and Suppliers में।

← भाग 09 · अगला अध्याय → भाग 11 · Read in English →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Q1: क्या सु-काम केस में IBBI ने आरपी और लिक्विडेटर दोनों पर कार्रवाई की थी?
हाँ। Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) की डिसिप्लिनरी कमेटी ने औपचारिक जाँच के बाद सु-काम के मामले में नियुक्त रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल और लिक्विडेटर दोनों को प्रक्रियागत उल्लंघनों का दोषी पाया और उन पर पेनल्टी आदेश पारित किए।
Q2: क्या IBBI की पेनल्टी से प्रभावित कंपनी या प्रमोटर को कोई मुआवज़ा मिलता है?
नहीं। आईबीसी के मौजूदा नियमों के तहत IBBI द्वारा लगाया गया जुर्माना सीधे सरकारी संचित निधि में जाता है। उस लापरवाही से बर्बाद हुई कंपनी, उसके कामगारों या प्रमोटर को किसी तरह का मुआवज़ा या रेस्टीट्यूशन देने का कोई प्रावधान नहीं है।
Q3: आरपी और लिक्विडेटर के आचरण पर क्या मुख्य आपत्तियाँ साबित हुईं?
जाँच में वैल्यूएशन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी, अमूर्त संपत्तियों (पेटेंट्स और ब्रांड) के मूल्यांकन में विसंगतियाँ, और लिक्विडेशन प्रक्रिया के दौरान नीलामी नियमों के उल्लंघन की पुष्टि हुई।

इस सीरीज़ में

The IBC Files: भारत का दिवालिया क़ानून — अनुभवजन्य रिकॉर्ड

हिंदी · भाग 01–17 लाइव

  1. भाग 01 · HI
    IBC के संशोधन: फ़ैक्टरी या बैंक का बहीखाता?
  2. भाग 02 · HI
    टूटा हुआ सिस्टम
  3. भाग 03 · HI
    IBC: क़र्ज़ का जाल
  4. भाग 04 · HI
    फ़ेयर बनाम लिक्विडेशन वैल्यू
  5. भाग 05 · HI
    Section 29A
  6. भाग 06 · HI
    CIRP की बेबसी: 180 दिन
  7. भाग 07 · HI
    जिस दिन सु-काम की मौत हुई
  8. भाग 08 · HI
    उद्यमी = मुजरिम
  9. भाग 09 · HI
    पर्सनल गारंटी का फंदा
  10. भाग 10 · आप यहाँ हैं
    आईबीबीआई पेनल्टी, शून्य मुआवज़ा
  11. भाग 11 · HI
    सप्लायर्स का मूक नरसंहार
  12. भाग 12 · HI
    कार और फ़ैक्टरी
  13. भाग 13 · HI
    होम लोन बनाम फ़ैक्टरी लोन
  14. भाग 14 · HI
    सुभाष चंद्रा केस
  15. भाग 15 · HI
    बिल्डर बनाम बाबू
  16. भाग 16 · HI
    77 पेटेंट और चीनी क़ब्ज़ा
  17. भाग 17 · HI
    राख से पुनर्जन्म
  18. भाग 18–20 · EN hub / आगामी →
कुंवर सचदेव

कुंवर सचदेव

संस्थापक एवं एमडी, सु-कैम पावर सिस्टम्स (1988–2019) और Kunwwer.ai — मैन्युफैक्चरिंग, दिवालियापन और सभ्यतागत स्मृति पर लेखन। उनकी कहानी पढ़ें →

पूर्ण अस्वीकरण →

Scroll to Top