कभी बसों में पेन बेचा करते थे कुँवर सचदेव — आज उनकी कंपनी सू-काम के इनवर्टर 70 देशों में बिकते हैं। दैनिक भास्कर ने भारत के ‘इनवर्टर मैन’ की यह प्रेरणादायक कहानी विस्तार से छापी।

दैनिक भास्कर ने अपनी सक्सेस स्टोरी सीरीज़ में कुँवर सचदेव की कहानी को विस्तार से जगह दी। दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद परिवार की मदद के लिए उन्होंने बसों और गलियों में पेन बेचना शुरू किया। यही अनुभव आगे चलकर एक ऐसे उद्यमी का जन्म देगा, जो पूरे देश के पावर बैकअप उद्योग की तस्वीर बदल देगा।
कैसे शुरू हुआ सू-काम
1998 में जब भारत बिजली कटौती से जूझ रहा था, कुँवर सचदेव ने सू-काम पावर सिस्टम्स की नींव रखी। शुरुआत छोटे इनवर्टर से हुई — लेकिन कुछ ही सालों में सू-काम इनवर्टर का पर्याय बन गया। भारत का पहला प्लास्टिक-बॉडी इनवर्टर उन्हीं के दिमाग की उपज थी, जिसे इंडिया टुडे ने ‘इनोवेशन ऑफ द डिकेड’ का दर्जा दिया।
70 देशों तक फैला कारोबार
अपने चरम पर सू-काम के इनवर्टर 70 से ज़्यादा देशों में बिकते थे — भारत से लेकर अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोप तक। कंपनी का कारोबार 2300 करोड़ रुपये तक पहुँचा। सचदेव ने पावर बैकअप, सोलर पावर और लिथियम बैटरी टेक्नोलॉजी में 100 से अधिक पेटेंट दायर किए — जो भारतीय इनवर्टर उद्योग में एक रिकॉर्ड है।
“अगर आपके पास सपना है और मेहनत करने का जज़्बा है, तो कोई भी काम छोटा नहीं है। मैंने पेन बेच कर शुरुआत की थी।”
— कुँवर सचदेव, संस्थापक, सू-काम