दैनिक जागरण, 18 फ़रवरी 2005: 800 करोड़ रुपये के इनवर्टर मार्केट में जगह बना चुके कुंवर सचदेव की Success Story — एक रेलवे कर्मचारी का बेटा, जो मेहनत के सौ करोड़ तक पहुँच गया।

दैनिक जागरण की 18 फ़रवरी 2005 की यह Success Story एक ऐसे उद्यमी की है जिसने 800 करोड़ रुपये के भारतीय इनवर्टर मार्केट में Su-Kam की पहचान बना दी — और वो भी अपनी मेहनत के दम पर।
रेलवे कर्मचारी का बेटा
कुंवर सचदेव के पिता रेलवे में काम करते थे — परिवार को इतनी सम्पन्नता विरासत में नहीं मिली। दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई के बाद उन्होंने संघर्ष करते हुए ख़ुद की जगह बनाई। 1997 में Su-Kam की नींव पड़ी।
गुणवत्ता का जुनून — और अवार्ड
क्वालिटी पर कुंवर का जुनून ऐसा था कि उन्हें 2003 में कारोबार का प्रतिष्ठित सम्मान मिला — एक ऐसा अवार्ड जो उन्होंने अपने कर्मचारियों को समर्पित कर दिया।
“पेंडुलम की तरह इधर-उधर हिलने की जगह सटीक लक्ष्य तय कीजिए — कर्मचारी ही आपकी असली पूँजी हैं।”— कुंवर सचदेव, दैनिक जागरण • 18 फ़रवरी 2005 (सीईओ की सीख)
माइक्रो-कंट्रोलर, डीएसपी — और तकनीक की चढ़ाई
कुंवर ने Su-Kam को क्वालिटी के दम पर आगे बढ़ाया — माइक्रो-कंट्रोलर और डीएसपी जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भारतीय इनवर्टर उद्योग में तब बड़ी बात थी। यही तकनीकी बढ़त कंपनी को उस स्तर पर ले गयी जहाँ 800 करोड़ के बाज़ार में उसकी अपनी पहचान बन सकी।
‘मैं ख़ुद को सीईओ नहीं मानता’
कुंवर का मानना है कि उनकी असली भूमिका एक मेंटर की है — बाक़ी टीम ख़ुद संभाल लेती है। यही सोच Su-Kam के अंदर एक ऐसी संस्कृति बना सकी जहाँ कर्मचारी सिर्फ़ कर्मचारी नहीं — कारोबार के असली मालिक थे।